शनिवार, 14 जनवरी 2012

जल का ज्योतिष में महत्त्व

जो जल अन्तरिक्ष में उत्पन्न होता है , जो जल नदी में बहता है , जो जल नहर , कुए आदि के रूप में खोदने से उत्पन्न होता है , जो जल झरनों आदि के रूप में स्वयं उत्पन्न होता है और जो समुद्र में जाकर मिल जाने वाला है , दिव्य गुणों से संपन्न ये सभी प्रकार के जल इस लोक में हमारी रक्षा करे | तात्पर्य यह है की जल ही हमारा रक्षक है | जल से ही प्रारंभ भी है और प्रारब्ध भी | जल स्रष्टि का आदि तत्व है | वह न केवल जीवन को धारण करता है , बल्कि स्वयं जीवन है | जल मानव की मुलभुत आवश्यकता है | जल तत्व की उचित स्थिति , भण्डारण व् उपयोग से जीवन में सुख , सम्रद्धि व् सफलता मिलती है | व्रहतासन्हिता में भू गर्भ जल का पता लगाने व् वर्षा सम्बन्धी योगो के बारे में विस्तृत वर्णन मिलता है | इसमे वर्षा , आंधी , तूफान , अतिवृष्टि व् अकाल आदि की जानकारी व् वर्षा के पूर्वानुमान के लिए अनेक विधिया दी गयी है | उनमे से एक है - सप्त नाडी चक्र | दरअसल हमारे ऋषि मुनियों ने अभिजित सहित आकाश मंडल के २८ नक्षत्रो को सात नाड़ियो- चांडा , वायु , दाह , सौम्या , नीरा , जला व् अमृता में बाटा गया है | यह चक्र इस सिद्दांत पर आधारित है की जलदायक नक्षत्रो से यदि जल दायक गृह मेल खाते है तो वर्षा सुनिश्चित है | रोहिणी वस् , सप्त नाडी चक्र व् सूर्य के आद्रा नक्षत्र में प्रवेश के समय गृह नक्षत्र की स्थिति से वर्षा का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है | इससे फसलो की पैदावार की स्थिति , अतिवृष्टि के कारन बाधा आदि का पूर्वानुमान लगाना भी संभव है | ज्योतिष में पुन्य व् परोपकार के लिए नवम भाव देखा जाता है चूँकि चद्रमा जल का कारक है ,अत:कुए तालाब आदि बनवाना ,प्याऊ लगवाना ,दूध व् सफ़ेद चीजो का दान चन्द्रमा व् नवम भाव को सुद्रढ़ करने के उपाय है | भारतीय ज्योतिष व् लोक परंपरा में जल को संकल्प व् साक्षी का दर्जा दिया जाता है | जल से अघर्य देना जल छिड़क कर स्वस्तिवाचन करना हमारी परंपरा के अंग है | भोजन से पूर्व प्रार्थना , पवित्रता के लिए जल का प्रयोग करना आदि भारतीय ज्योतिषी की विशेषता है | एसा कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं जिसमे जल कलश का पूजन न होता हो | इस कलश में सभी पवित्र नदियो तीन देवो , सात द्वीपों पृथ्वी व् सात समुन्द्रों का आव्हान किया जाता है | इस प्रकार यह ब्रम्हाण्ड का प्रतिक बन जाता है | जल तत्व का सम्बन्ध कर्क , वृश्चिक व् मीन राशियों से है | अत : ये राशिया जल तत्व राशिया मानी जाती है | जल तत्व का सम्बन्ध जन्म कुंडली के चतुर्थ , अष्टम व् द्वादश भाव से माना जाता है | जल तत्व वाले जातक अति भावुक , संवेदनशील व् ऐसी राशियों के जातको से अधिक भाव प्रवण होते है | ज्योतिष के अनुसार चन्द्रमा जल व् मन का कारक है | यह हमारी मानसिक स्थिति पर गहरा प्रभाव डालता है | यह जन्म कुंडली के चतुर्थ भाव पर अधिपत्य रखता है , जो हमारी सुख सम्रद्धि का कारक है | हमारी मानसिक शांति , आर्थिक स्थिति व् सुख के कारक चन्द्रमा का घर में जल के प्रवाह व् उपयोग के साथ सहज सम्बन्ध है | चन्द्रमा हमारे नकद धन का कारक भी है | ऐसा देखा गया है की यदि किसी घर में पानी की कमी हो तो वहा धन स्त्रोतों में भी दिक्कत आती है | वराहमिहिर व् वृहत्संहिता में जमीं के नीचे पानी होने की जो प्रम्मानिक पहचाने बताई है वे आज भी प्रासगिक है |आज जल संकट के समय में इसकी खोज में ज्योतिष के जल सम्बन्धी सूत्रों की गहरी प्रसिंगिता है |पवित्र नदिया ,सरोवरों में स्नान करना ,उनकी आरती उतारना आदि केवल कर्म कांड भर नही है |यही कर्म कांड यह सकेत भी देते है की जल पावित है |और उसे पर्वित्र रखने में ही भलाई है |

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